नई दिल्ली, अनिल सिंह चौहान
हिमालयी राज्यों के दुर्गम व सुदूर सीमावर्ती इलाकों में सफर करने वाले पर्यटकों और एडवेंचर टूरिज्म के शौकीनों के लिए राहत की बड़ी खबर है। राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसपीएल) लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक 10,000 फीट से अधिक की ऊंचाई वाले राष्ट्रीय राजमार्गों पर हर 50 किलोमीटर की दूरी पर इमरजेंसी रिस्पॉन्स सेंटर (ईआरसी) स्थापित करने जा रहा है।
इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य उद्देश्य अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऑक्सीजन की कमी से होने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से यात्रियों को बचाना, दुर्घटना या वाहन खराब होने पर त्वरित सहायता पहुंचाना और नो-नेटवर्क जोन में कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना है। सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मेडिकल व ऑक्सीजन सपोर्ट: 10,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर हवा पतली होने के कारण पर्यटकों को ‘एक्यूट माउंटेन सिकनेस’ (एएमएस), चक्कर आने और सांस लेने में तकलीफ जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन इमरजेंसी सेंटरों पर मेडिकल-ग्रेड ऑक्सीजन, पोर्टेबल सिलेंडर, प्राथमिक उपचार उपकरण और प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ चौबीसों घंटे तैनात रहेगा।
ब्रेकडाउन और मैकेनिकल सहायता: बर्फीले, बेहद खतरनाक और पथरीले रास्तों पर वाहनों के अचानक खराब होने या दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में क्रेन, टोइंग वाहन और मैकेनिकल सपोर्ट उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे यात्री बीच रास्ते में न फंसे रहें।
नो-नेटवर्क जोन में सैटेलाइट एसओएस से कनेक्टिविटी: जिन क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क की सुविधा शून्य (नो नेटवर्क जोन) है, वहां सैटेलाइट आधारित एसओएस इमरजेंसी कम्युनिकेशन सिस्टम स्थापित किया जाएगा। इसके जरिए आपात स्थिति में यात्री सीधे कंट्रोल रूम को अलर्ट या मैसेज भेजकर तुरंत मदद प्राप्त कर सकेंगे।
अस्थाई शेल्टर और राहत: अचानक होने वाले भूस्खलन, भारी बर्फबारी या मौसम खराब होने पर फंसे यात्रियों और ड्राइवरों के लिए इन सेंटरों में रुकने और खाने-पीने का अस्थाई इंतजाम रहेगा।
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सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षित होगा सफर, एडवेंचर टूरिज्म को मिलेगी नई रफ्तार
लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती व ऊंचाई वाले रास्तों पर हर साल लाखों बाइकर्स, ट्रैकिंग के शौकीन और देशी-विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं। नेटवर्क न होने और अचानक तबीयत बिगड़ने पर समय पर इलाज न मिलने से पहले कई बार जानलेवा हादसे हो चुके हैं।
विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, यह परियोजना केवल सड़कों के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिमालयी क्षेत्रों में सुरक्षित यात्रा का एक सुरक्षा कवच है। पहले चरण में सबसे ज्यादा संवेदनशील और अधिक ऊंचाई वाले मार्गों (जैसे मनाली-लेह मार्ग, उमलिंग ला रोड और अरुणाचल के तवांग-सेला पास रूट) को प्राथमिकता के आधार पर शामिल किया जा रहा है।”
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क्यों पड़ी इस सिस्टम की जरूरत?
अचानक ऑक्सीजन का गिरना: 10,000 फीट से ऊपर शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरता है, जिससे पर्यटकों की जान को खतरा हो जाता है।
दुर्गम रास्ते और खराब मौसम: भारी बर्फबारी और लैंडस्लाइड के कारण गाड़ियां घंटों फंसी रहती हैं।
कम्युनिकेशन ब्लैकआउट: अधिकांश हाई-एल्टीट्यूड रूट पर मोबाइल सिग्नल नहीं होते, जिससे मदद बुलाना नामुमकिन हो जाता है। सैटेलाइट एसओएस इस समस्या को पूरी तरह खत्म कर देगा।
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-हाईवे हर 50 किमी पर बनेंगे इमरजेंसी रिस्पॉस सेंटर
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