नई दिल्ली, अरविंद सिंह
बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच केंद्र सरकार ने देश की सुरक्षा को अभेद्य और दूरगामी सामरिक आयाम देने के लिए अपनी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता का विस्तार शुरू कर दिया है। इसके तहत पहली बार महत्वाकांक्षी रेल-आधारित मिसाइल लॉन्चिंग और कैनिस्टराइज्ड वैगन कैप्सूल तकनीक पर काम शुरू किया गया है। नए डिजाइन के रेल कंटेनर कैप्सूल से ही अग्नि श्रृंखला की घातक मिसाइलों को बार्डर सहित देश के किसी भी कोने से लॉन्च किया जा सकेगा। यह स्वदेशी और अत्याधुनिक रेल-मोबाइल मिसाइल तकनीक से भारत दुनिया की उन
चुनिंदा महाशक्तियों रूस और चीन की कतार में खड़ा हो जाएगा, जिनके पास पटरियों से सीधे परमाणु मिसाइलें दागने की क्षमता है।
रेल मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और रेलवे का मिलिट्री ट्रैफिक डायरेक्टरेट मिलकर इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। प्रोजेक्ट के शुरुआती चरण के तहत डीआरडीओ द्वारा 1 से 2 प्रायोगिक और परीक्षण वैगनों (प्रोटोटाइप) का निर्माण किया जा रहा है। सफल परीक्षणों के उपरांत इसे 1 से 2 पूर्ण मिसाइल रेजीमेंट (लगभग 6 से 12 विशेष मिसाइल ट्रेनें) के रूप में सेना में शामिल करने का अनुमान है।
वहीं, दीर्घकालिक योजना के तहत सरकार 15 से 20 रेल-लॉन्चर कैप्सूल का एक बड़ा फ्लीट तैयार किया जा सकता है। सूत्रों ने बताया कि चीन और पाकिस्तान से लगते विशाल बार्डर ये विशेष मिसाइल ट्रेनें भारत के विभिन्न रेल मार्गों पर गश्त कर सकेंगी। कैनिस्टराइज्ड वैगन कैप्सूल खुद में एक चलता-फिरता मिसाइल साइलो (लॉचिंग सिस्टम) है। प्रत्येक मिसाइल ट्रेन में 2 से 4 विशेष वैगन होंगे, जिनमें अग्नि-5 या अग्नि-प्राइम जैसी कैनिस्टराइज्ड मिसाइलें तैनात रहेंगी।
———————
बॉक्स
कंटेनर कैप्सूल बाहर से सामान्य मालगाड़ी जैसी दिखेगी। दुश्मन के जासूसी उपग्रह या ड्रोन नहीं भांप सकेंगे कि किस डिब्बे में सामान है और किसमें परमाणु मिसाइल छिपी है। मिसाइलें सीलबंद कंपोजिट कैनिस्तर के अंदर वर्षों तक पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी। हमले के समय वैगन का ऊपरी हिस्सा खुलेगा और अत्यधिक शक्तिशाली हाइड्रोलिक जैक पटरी के किनारे जमीन पर टिक जाएंगे, जिससे लॉन्च के जबरदस्त झटके के बावजूद ट्रेन संतुलित रहेगी।
———————
अब तक रेलवे का उपयोग केवल रक्षा उपकरणों या मिसाइल घटकों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने (लॉजिस्टिक ट्रांसपोर्ट) के लिए सामान्य मालगाड़ियों या फ्लैटबेड वैगनों पर किया जाता था। परमाणु प्रतिरोधक ढांचा अब तक मुख्य रूप से टीईटीआरए ट्रकों और ट्रेलरों पर निर्भर रहा है, जबकि नया कैनिस्टराइज्ड रेल-लॉन्चर कैप्सूल परिवहन और लॉन्चिंग दोनों का काम करेगा। सड़क की तुलना में रेल से मिसाइलों को सीमा तक पहुंचाने का समय 60 फीसदी घट जाएगा। भारी बर्फबारी या बारिश में भी मिसाइलें 70 से 80 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से किसी भी कोने में भेजी जा सकेंगी।
———————–
रूस: शीत युद्ध के समय सोवियत संघ ने 12 मिसाइल ट्रेनें तैनात की थीं। रूस का पुराना सिस्टम काफी भारी था, जबकि भारत का नया सिस्टम आधुनिक, हल्का और अत्यधिक गतिशील कैनिस्तर तकनीक पर आधारित है।
चीन: चीन के पास अनुमानित 2 से 4 सक्रिय रेल-लॉन्च ब्रिगेड (10 से 20 DF-41 मिसाइलें) हैं, जो पहाड़ियों में बनी सुरंगों से बाहर निकलकर लॉन्च करती हैं।
——————-
