नई दिल्ली, अनिल सिंह चौहान
चीन और पाकिस्तान की सरहद पर तैनात भारतीय सेना और वहां की आम जनता के लिए अब भीषण ठंड और बर्फीला तूफान रुकावट नहीं बन पाएंगे। केंद्र सरकार जमीन पर हाइड्रोनिक स्नो मेल्टिंग सिस्टम नामक एक ऐसी क्रांतिकारी व स्वदेशी तकनीक उतार रही है, जिससे शून्य से नीचे तापमान होने पर भी सड़कें खुद-ब-खुद बर्फ को पानी बना देंगी। इस तकनीक में न तो रास्ते बंद होंगे और न गाड़ियां फिसलेंगी, जिससे सेना के भारी टैंकों से लेकर आम जनता के वाहन साल के बारह महीने सरहद की सड़कों पर सरपट दौड़ सकेंगे।
सड़क परिवहन मंत्रालय और सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) संयुक्त रूप से हाइड्रोनिक स्नो मेल्टिंग सिस्टम ( आम भाषा में इसे जियो-थर्मल हीटिंग पाइप्स तकनीक कहा जाता है) का अंतिम परीक्षण कर रहे हैं। आईआईटी दिल्ली के सिविल और थर्मल इंजीनियरिंग विभाग का इसमें अहम रोल रहा है। इस स्वदेशी तकनीक के तहत सड़कों के नीचे हीटिंग सिस्टम एक्टिव किया जाएगा, जो गिरती बर्फ को सड़क पर टिकने ही नहीं देगा।
सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मंहगी तकनीक के चलते कनाडा, अमेरिका, रूस में बर्फ हटाने के लिए बड़ी स्नो-प्लो मशीनों और नमक के छिड़काव का सहारा लिया जाता है। लेकिन भारत ने अपनी सामरिक आवश्यकताओं को देखते हुए स्मार्ट और किफायती रास्ता निकाला है।
उन्होंने कहा कि पूरे हाईवे के बजाय केवल जटिल चोक स्थलों जैसे अत्यधिक ढलान, तीखे मोड़ और सुरंगों के मुहानों पर मेल्टिंग तकनीक लगाई जाएगी। जहां गाड़ियां अक्सर फिसलकर फंस जाती हैं और सेना का पूरा काफिला रुक जाता है। तकनीक भू-गर्भीय ऊर्जा और लद्दाख व हिमाचल में जमीन के करीब मौजूद गर्म पानी के सोतों की प्राकृतिक गर्मी की मदद से बर्फ पिघलाई जाएगी। इसमें बाहरी बिजली या गैस की खपत न के बराबर होगी। यह तकनीक एडवांस्ड फील्ड ट्रायल के चरण में है। दिसंबर तक ज़ोजिला पास और अरुणाचल के सेला पास पर इसका पहला पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाएगा।
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क्या है हाइड्रोनिक स्नो मेल्टिंग सिस्टम :
इस सिस्टम में सड़क के कंक्रीट बेस के नीचे विशेष एंटी-फ्रीज फ्लूइड (प्रोपलीन ग्लाइकोल मिश्रण) से भरी मजबूत, टेक्टोनिक-प्रेशर झेलने वाली पाइपलाइन बिछाई जाएंगी। यह फ्लूइड जमीन के नीचे की जियो-थर्मल गर्मी को सोखकर ऊपर सड़क की सतह के तापमान को जीरो से ऊपर (4-8 डिग्री) रखता है। जिससे गिरने वाली बर्फ सड़क पर टिक ही नहीं पाती और तुरंत पानी बनकर बह जाती है।
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मंहगी, लेकिन दीर्घकालिक रूप से किफायती
इस तकनीक में अंडरग्राउंड पाइपिंग, हीट पंप और सेंसर जैसी एडवांस प्रणालियां शामिल हैं, इसलिए इसकी प्रारंभिक निर्माण लागत लगभग 20 करोड़ से 25 करोड़ प्रति किलोमीटर आती है।
हर साल बर्फ हटाने और क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत पर होने वाले करोड़ों के मेंटेनेंस खर्च को देखते हुए दीर्घकालिक रूप से यह तकनीक बेहद किफायती साबित होगी।
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चार राज्यों में लागू होगी तकनीक
लद्दाख (ज़ोजिला पास और चांग ला): तकनीक को श्रीनगर-लेह राजमार्ग पर स्थित ज़ोजिला और लेह-पैंगोंग मार्ग पर स्थित चांग ला के सबसे खतरनाक मोड़ों पर लगाया जाएगा।
अरुणाचल प्रदेश (सेला पास): तवांग को जोड़ने वाले रणनीतिक मार्ग पर स्थित सेला टनल के एप्रोच रोड्स पर इसका इस्तेमला होगा।
हिमाचल प्रदेश (रोहतांग एप्रोच और शिंकु ला पास): मनाली-लेह कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए मेल्टिंग तकनीक लगेगी।
उत्तराखंड (माना और नीति पास): चीन सीमा से सटे अग्रिम मोर्चों को जोड़ने वाली सड़कों के ढलान वाले हिस्सों पर इसे लागू किया जाएगा।
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