सुरक्षित सफर होगा आपका अधिकार, राइट टू सेफ पैसेज जल्द लागू होगा

सरकार देगी मुआवजा, दोषपूर्ण हाईवे डिजाइन में होने पर

नई दिल्ली, अनिल सिंह चौहान
देश की सड़कों पर होने वाले हादसों के लिए अब सिर्फ ड्राइवर की लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी एजेंसियों की नाकामी भी तय होगी। भारत के नागरिकों को जल्द ही सुरक्षित सड़क का अधिकार (राइट टू सेफ पैसेज) का कानूनी हक मिलने जा रहा है। इसके तहत नेशनल हाईवे-एक्सप्रेसवे की त्रुटिपूर्ण डिजाइन, खराब इंजीनियरिंग या ब्लैक स्पॉट के कारण दुर्घटना होती है, तो पीड़ित परिवार भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से भारी मुआवजे का हकदार होगा।
अदालतों द्वारा सड़क सुरक्षा को संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) के तहत मौलिक अधिकार घोषित किए जाने के बाद सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन का ड्राफ्ट तैयार कर रहा है। यह कानून सड़क हादसों में जवाबदेही का पूरा ढांचा बदल कर रख देगा।
इस नए कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें मुआवजे की राशि अधिकारियों की दया या अंदाज़े पर निर्भर नहीं होगी। हालांकि इसके लिए पीड़ित परिवार को कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्य और सबूत जुटाने होंगे। एफआईआर में पुलिस शिकायत में स्पष्ट लिखवाना होगा कि दुर्घटना का कारण सड़क की खराब स्थिति या त्रुटिपूर्ण डिजाइन थी। दुर्घटना स्थल, वाहन की स्थिति और सड़क की खामी (जैसे- गहरा गड्ढा, अचानक खत्म होती लेन, साइन बोर्ड न होना या गलत ढलान) की साफ तस्वीरें और वीडियो जरूर लें। जोकि डिजिटल साक्ष्य का काम करेंगे।
इसके पश्चात पीड़ित को मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (एमएसीटी) में याचिका दायर करनी होगी। दोष सिद्ध होने पर ट्रिब्यूनल द्वारा तय मुआवजा एनएचएआई को 6 से 8 सप्ताह के भीतर पीड़ित परिवार को सौंपना होगा। यदि मुआवजा राशि देने में देरी होती है, तो इस पर 9 से 12 फीसदी का भारी वार्षिक ब्याज लगाया जाएगा, ताकि पीड़ित परिवार को दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।
————————-

बॉक्स
देश में ब्लैक स्पॉट हर 13 हजार जानें जाती हैं
सड़क मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि देश के राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क पर वर्तमान में कुल 13,795 ब्लैक स्पॉट चिन्हित हैं। इनमें से केवल 5,036 ब्लैक स्पॉट्स में ही अब तक सुधार हो सका है, जबकि हर साल 1,200 से 1,500 नए ब्लैक स्पॉट बन जाते हैं। सरकार नए कानून इस सुरक्षित सड़कें बनाना सुनिश्चत करना चाहती है।
————-

डीएम की टास्क फोर्स और साइंटिफिक क्रैश रिपोर्ट तय करेगी दोष:
मंत्रालय के अधिकारी ने बताया कि इस कानून को पारदर्शी बनाने के लिए हर जिले में गठित डिस्ट्रिक्ट हाईवे सेफ्टी टास्क फोर्स (जिसके अध्यक्ष जिला मजिस्ट्रेट या डीएम होते हैं) दुर्घटना स्थल की प्राथमिक जांच करेगी। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड या स्वतंत्र परीक्षक 30 दिनों के भीतर अपनी वैज्ञानिक क्रैश रिपोर्ट ट्रिब्यूनल को सौंपेंगे। यह रिपोर्ट पूरी तरह निष्पक्ष होगी और वैज्ञानिक तरीके से तय करेगी कि हादसे में गलती सड़क की बनावट की थी या ड्राइवर की।
——————–

दुनिया में क्या है व्यवस्था:
अमेरिका:यहां 1946 से फेडरल टॉरट क्लेम्स एक्ट (एफटीसीए) लागू है। सड़क की खराबी से दुर्घटना होने पर नागरिक सीधे सरकार पर मुकदमा कर सकते हैं। अमेरिकी अदालतें एजेंसियों पर करोड़ों डॉलर का जुर्माना लगाती हैं।
यूरोपीय संघ: यूरोपीय देशों में राजमार्गों का अनिवार्य सेफ्टी ऑडिट होता है। सड़क की गलत बनावट के कारण हादसा होने पर वहां की रोड अथॉरिटी को भारी मुआवजा देना पड़ता है।
चीन: पिछले दो दशकों में चीन ने सड़क सुरक्षा कानूनों को बेहद सख्त किया है। वहां खराब सड़कों के कारण हादसा होने पर फास्ट-ट्रैक कोर्ट के जरिए त्वरित मुआवजा दिलाया जाता