मुंबई-अहमदाबाद के बीच स्वदेशी सिग्नल सिस्टम पर देसी बुलेट ट्रेन फर्राटा भरेगी

वंदे भारत प्लेटफार्म पर बनाई जा रही है देसी बुलेट ट्रेन

नई दिल्ली, अनिल सिंह चौहान
देश के पहले मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर पर अब जापानी तकनीक के स्थान पर स्वदेशी सिग्नल सिस्टम पर देसी बुलेट ट्रेन फर्राटा भरेगी। केंद्र सरकार ने जापान की सिग्नलिंग सिस्टम की जगह भारत की स्वदेसी अत्याधुनिक ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन तकनीक कवच 4.0 को लागू करने का बड़ा फैसला किया है। सरकार के इस रणनीतिक कदम से सिग्नलिंग में करीब 4,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। वहीं, रेल यात्री विश्वस्तरीय सुविधाओं से लैस देसी बुलेट ट्रेन में बजट-फ्रेंडली सफर का लुफ्त उठा सकेंगे।

रेलवे बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस फैसले का मुख्य कारण जापानी सिग्नलिंग प्रणाली का क्लोज्ड प्रोपराइटरी पेंच था। जापान अपनी सिग्नल टेक्नोलॉजी का सोर्स कोड भारत के साथ साझा करने या ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी (टीओटी) देने को तैयार नहीं था। इसेस अगले 30-40 वर्षों तक इस पूरे कॉरिडोर के रखरखाव, सॉफ्टवेयर अपग्रेडेशन और स्पेयर पार्ट्स के लिए रेलवे पूरी तरह जापानी वेंडर्स के इशारों पर निर्भर रहता। इसको देखते हुए सरकार ने स्वदेशी टक्करोधी प्रणली कचव 4.0 को अपनाने का फैसला किया है।

अधिकारी ने बताया कि कवच 4.0 (एसआईएल-4 सर्टिफाइड) यूरोपीय मानकों (ईटीसीएस लेव-2) के समकक्ष अल्ट्रा-हाई-स्पीड टेक्नोलॉजी पर काम करता है। आरएफआईडी टैग और हाई-स्पीड ऑप्टिकल फाइबर केबल (ओएफसी) की मदद से ट्रेन के सटीक स्थान और दिशा को हर मिलीसेकंड में ट्रैक करता है। स्टेशन मास्टर मास्टर कंप्यूटर लोकोमोटिव में लगे रेडियो रिसीवर को लगातार गति सीमा और सिग्नल डेटा भेजते हैं। निर्धारित गति से अधिक गाड़ी चलने या अवरोध होने पर ऑन-बोर्ड कवच कंप्यूटर बिना मानवीय हस्तक्षेप के स्वचालित रूप से इमरजेंसी ब्रेक लगा देता है। यह तकनीक दो ट्रेनों के आमने-सामने टकराने या गलत ट्रैक पर जाने की संभावना शून्य हो जाती है।
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अधिकारी ने बताया कि जापानी सिस्टम में ट्रैकसाइड इंफ्रास्ट्रक्चर बिछाने का खर्च लगभग 8 से 10 करोड़ प्रति किलोमीटर आ रहा था, जबकि स्वदेशी कवच 4.0 तकनीक में यह लागत घटकर मात्र 50 लाख प्रति किलोमीटर रह जाती है, जो कि सीधे तौर पर 95 फीसदी तक की बचत है। पूरे 508 किलोमीटर लंबे रूट पर रेलवे को जापानी मॉडल की तुलना में 4,000 करोड़ से अधिक की बचत होगी।
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ट्रेन के इंजन (ऑन-बोर्ड) में लगाए जाने वाले उपकरणों की बात करें तो जापानी सिस्टम के लिए प्रति ट्रेन सेट लगभग 12 से 15 करोड़ का खर्च आता, जबकि स्वदेशी ऑन-बोर्ड उपकरण मात्र 80 लाख प्रति ट्रेन में तैयार हो जाते हैं, जिससे इस मद में 94 फीसदी की बचत होगी।
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सिग्नल सिस्टम के परिचालन पर विदेशी स्पेयर पार्ट्स और जापानी इंजीनियरों पर प्रतिवर्ष लगभग 800 से 1,000 करोड़ का खर्च प्रस्तावित था। घरेलू कंपनियों और स्वदेशी स्पेयर पार्ट्स द्वारा संचालित कवच 4.0 प्रणाली का सालाना खर्च घटकर केवल 80 से 100 करोड़ रह जाएगा। स्वदेशी सिग्नलिंग से हर साल 90 फीसदी परिचालन बचत होगी और विदेशी मुद्रा की भी भारी बचत होगी।
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जापानी शिंकानसेन (ई5) के आयात पर 10-कोच जापानी ट्रेन सेट (बुलेट ट्रेन) की कीमत 450 से 500 करोड़ प्रति ट्रेन पड़ रही थी।
भारत में तैयार हो रही 8-कोच वाली एल्युमिनियम बॉडी बुलेट ट्रेन की अनुमानित लागत 390 से 400 करोड़ प्रति ट्रेन है।
ट्रेन सेट्स की खरीद में रेलवे को 20 से 22 प्रतिशत का सीधा फायदा मिलेगा। देसी बुलेट ट्रेन 250 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार पर दौड़ेगी जिसे बाद में उन्नत कर 320 की रफ्तार पर चलाया जा सकेगा