कश्मीरी पंडितों को मिल रहे धमकी भरे पत्र गंभीर मुद्दा, ठोस कार्रवाई की दरकार : अशोक कुमार भट्ट
नई दिल्ली, रवि पंडिता
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बाद जेकेजेडीएफ (माइनॉरिटी सेल) के महासचिव अशोक कुमार भट्ट ने कश्मीरी पंडितों को मिल रही धमकी भरी चिट्ठियों और जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने में हो रही देरी पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि कश्मीरी पंडितों को लगातार मिल रहे धमकी भरे पत्र और राज्य के दर्जे में देरी एक गंभीर मुद्दा है, जिस पर तुरंत ठोस कार्रवाई होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न उग्रवादी या छद्म संगठनों के नाम से बार-बार धमकी भरे पत्र आना गंभीर चिंता का विषय है, खासकर तब जब ऐसे पत्रों में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी शामिल होती है। हालिया रिपोर्टों में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों के नाम वाले धमकी भरे पत्रों को दर्ज किया गया है, और कुछ मामलों में उनके पते व अन्य व्यक्तिगत जानकारी भी सार्वजनिक की गई है। सुरक्षा एजेंसियां इन पत्रों की प्रामाणिकता और स्रोत की जांच कर रही हैं।
भट्ट ने कहा, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ये पत्र किसने जारी किए हैं, बल्कि यह है कि पूरा सुरक्षा और खुफिया तंत्र तथा आधुनिक तकनीक होने के बावजूद इसके पीछे मौजूद लोग अब तक बेनकाब क्यों नहीं हो पाए हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इन धमकियों के पीछे पारंपरिक आतंकवाद के अलावा अन्य मकसद भी हो सकते हैं, जिसमें वापस लौटने की कोशिश कर रहे विस्थापित कश्मीरी पंडितों के बीच भय पैदा करने का प्रयास, या विवादित अथवा संकटग्रस्त संपत्तियों जैसे मामलों में अन्य हित शामिल हो सकते हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसी संभावनाओं की जांच की जानी चाहिए, केवल अनुमान नहीं लगाया जाना चाहिए, और धमकी देने वालों की पहचान, मकसद और संगठनात्मक संबंधों को निश्चित रूप से स्थापित किया जाना चाहिए। किसी समुदाय से बार-बार बनी रहने वाली अनिश्चितता के माहौल में अपने गृहक्षेत्र में जीवन को पुनर्गठित करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
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राज्य का दर्जा एक लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता है :
राज्य का दर्जा बहाल करने पर भट्ट ने संसद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा दिए गए उस आश्वासन को याद दिलाया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उपयुक्त समय आने पर जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल कर दिया जाएगा। गृह मंत्रालय द्वारा राज्यसभा में 2022 में दिए गए एक लिखित उत्तर में भी औपचारिक रूप से इस रुख को दर्ज किया गया था।
उन्होंने कहा कि राज्य का दर्जा केवल एक राजनीतिक नारा बनकर नहीं रहना चाहिए जो चुनाव या प्रदर्शनों के दौरान ही सामने आए। यह जम्मू-कश्मीर के लोगों की संवैधानिक और प्रशासनिक स्थिति से जुड़ा एक लोकतांत्रिक मुद्दा है। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य के दर्जे की बहाली को राजनीतिक सौदेबाजी के साधन के रूप में देखने के बजाय एक संस्थागत प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए।
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पहचान के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों जरुरी :
यह स्वीकार करते हुए कि 2019 के संवैधानिक बदलावों ने जम्मू-कश्मीर के पिछले संवैधानिक ढांचे को बदल दिया था, उन्होंने कहा कि ऐसे तंत्रों पर नए सिरे से चर्चा की आवश्यकता है जो इस क्षेत्र के विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय हितों की रक्षा कर सकें।
भट्ट ने कहा, अनुच्छेद 370 को भले ही हटा दिया गया हो, लेकिन हमारी पहचान की रक्षा का सवाल खत्म नहीं हुआ है। हमें संवैधानिक सुरक्षा उपायों की जांच करने की आवश्यकता है, जिसमें जम्मू-कश्मीर के अनुकूल ‘अनुच्छेद 371’ जैसे ढांचे की संभावना भी शामिल है।
अनुच्छेद 371 के तहत सुरक्षा का उनका यह सुझाव एक राजनीतिक मांग है, न कि जम्मू-कश्मीर के लिए वर्तमान में मौजूद कोई संवैधानिक प्रावधान, अनुच्छेद 371 और उससे संबंधित प्रावधान वर्तमान में भारत के कुछ विशेष राज्यों और क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्था प्रदान करते हैं।
भट्ट ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को केवल परस्पर विरोधी राजनीतिक बयानों के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर के लोगों को सुरक्षा, गरिमा, लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक विश्वास की आवश्यकता है। इन्हें चुनिंदा तरीके से प्रदान नहीं किया जा सकता और न ही अनिश्चित काल के लिए टाला जा सकता है। उन्होंने दोहराया कि जेकेजेडीएफ माइनॉरिटी सेल लोकतांत्रिक और संवैधानिक माध्यमों से कश्मीरी पंडितों तथा अन्य संवेदनशील समुदायों की सुरक्षा, अधिकारों और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों को उठाना जारी रखेगा।
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