रेलवे नियम तोड़ने की भारी कीमत चुका रहे है रेल यात्री

एक साल में मुसाफिरों ने भरा 2200 करोड़ से अधिक जुर्माना
नई दिल्ली, अनिल सिंह चौहान
भारतीय रेल में मांग के मुकाबले कन्फर्म सीटों की भारी किल्लत और त्योहारों तथा छुट्टियों के दौरान घर पहुंचने की आपाधापी यात्रियों को नियम दरकिनार कर सफर करने पर मजबूर कर रही है। हालांकि, नियमों की यह अनदेखी रेल यात्रियों की जेब पर बेहद भारी पड़ रही है। संसद में रेल मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, बीते एक वित्त वर्ष के दौरान रेलवे ने नियम तोड़कर यात्रा करने वाले 3.61 करोड़ से अधिक यात्रियों को पकड़ा और उनसे जुर्माने व अतिरिक्त शुल्क के रूप में 2,231.74 करोड़ रुपये का राजस्व वसूला है। ट्रेनों में अनधिकृत प्रवेश और नियमों के उल्लंघन को रोकने के लिए रेलवे प्रशासन ने सालभर में 5.39 लाख से अधिक औचक जांच अभियान चलाए।
आंकड़ों के विश्लेषण से साफ होता है कि पकड़े गए कुल मामलों में लगभग 60 फीसदी यानी 2.16 करोड़ यात्री ऐसे थे, जो बिना किसी टिकट के ही यात्रा कर रहे थे। रेलवे ने केवल इन बेटिकट यात्रियों से अतिरिक्त शुल्क के तौर पर 562.40 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया, जो कुल वसूली गई राशि का 25.20 प्रतिशत है। वहीं शेष मामलों में ऐसे लोग शामिल थे जो कम दूरी का टिकट लेकर लंबी दूरी तय कर रहे थे, सामान्य श्रेणी का टिकट लेकर स्लीपर या एसी डिब्बों में सवार थे अथवा बिना बुकिंग के अतिरिक्त सामान ले जा रहे थे। रेलवे द्वारा चलाए गए इस शिकंजे का असर अगले वित्त वर्ष 2024-25 में भी दिखा, जहां 5.09 लाख चेकिंग अभियानों के दौरान 3.10 करोड़ अनियमित यात्री धराए और उनसे 1,780.76 करोड़ रुपये की पेनल्टी वसूली गई।
रेल मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यात्रियों द्वारा नियम तोड़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण मांग और उपलब्ध सीटों के बीच का भारी अंतर है। पर्व-त्योहारों, छुट्टियों और श्रमबल के प्रवास के दौरान उत्तर और पूर्वी भारत जाने वाले प्रमुख रूटों पर यात्रियों का दबाव अचानक कई गुना बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में कन्फर्म टिकट न मिलने पर यात्री जोखिम उठाकर वेटिंग या जनरल टिकट के सहारे आरक्षित कोचों में चढ़ जाते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले यात्रियों की एक बड़ी तादाद ऐसी भी है, जिन्हें रेलवे के विभिन्न टिकट और कोच संबंधी कड़े नियमों की स्पष्ट जानकारी नहीं होती।
विशेषज्ञों के अनुसार, यात्रियों पर केवल दंडात्मक कार्रवाई करना, पेनल्टी वसूलना या जुर्माना बढ़ाना इस समस्या का स्थाई हल नहीं है। रेलवे का मुख्य ध्यान केवल राजस्व बढ़ाने पर होने के बजाय यात्रियों को सुगम और सुरक्षित सफर देने पर होना चाहिए। इसके लिए मांग वाले रूटों पर ट्रेनों की संख्या बढ़ाने, सामान्य (जनरल) डिब्बों की संख्या में इजाफा करने और रेलवे स्टेशनों के प्लेटफॉर्म स्तर पर ही डिजिटल माध्यमों से कड़ी प्रवेश जांच व्यवस्था (एक्सेस कंट्रोल) लागू करने की सख्त आवश्यकता है, ताकि बिना वैध टिकट के अनधिकृत यात्री ट्रेन के आरक्षित डिब्बों तक पहुंच ही न सकें।
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आंकड़ों में समझें रेलवे की कार्रवाई
  • 5.39 लाख: सालभर में चलाए गए कुल औचक चेकिंग अभियान।
  • 3.61 करोड़: नियम तोड़कर सफर करते पकड़े गए कुल यात्री।
  • 2.16 करोड़: बिना टिकट सफर करने वाले यात्रियों की संख्या (कुल मामलों का लगभग 60%)।
  • ₹2,231.74 करोड़: यात्रियों से वसूला गया कुल जुर्माना और अतिरिक्त शुल्क।
  • ₹562.40 करोड़: केवल बिना टिकट यात्रियों से वसूला गया पेनल्टी शुल्क।
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क्या है समस्या और स्थाई समाधान?
  • मुख्य कारण: मांग के मुकाबले कन्फर्म सीटों की भारी कमी, भीड़ के वक्त वेटिंग टिकट पर सफर का जोखिम और ग्रामीण यात्रियों में नियमों के प्रति जागरूकता का अभाव।
  • विशेषज्ञों का सुझाव:
    1. ज्यादा दबाव वाले रेल मार्गों पर अतिरिक्त विशेष ट्रेनें और सामान्य कोच बढ़ाए जाएं।
    2. मेट्रो की तर्ज पर प्लेटफॉर्म पर ही डिजिटल चेकिंग और ऑटोमैटिक एंट्री गेट लगाए जाएं ताकि अनधिकृत यात्री डिब्बों तक न पहुंच सकें।