विश्व की सबसे लंबी है देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन

हाइड्रोजन तकनीक में दुनिया के एलीट क्लब में शामिल होगा भारत

नई दिल्ली, अतुल सिंह
पिछले दिनों भारतीय रेल के स्वर्णिम इतिहास में एक नया अध्याय गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत माह विश्व की सबसे लंबी हाइड्रोन ट्रेन (जींद-सोनीपत) को हरी झंडी दिखाकर किया है। विकसित देशों की हाइड्रोजन ट्रेनें आमतौर पर 2 से 4 डिब्बों की होती हैं। वहीं, भारतीय रेल की यह ट्रेन 10 कोच (8 पैसेंजर डिब्बे और 2 ड्राइविंग पावर कार) की है, जोकि जर्मनी की मूल ट्रेन के आकार से लगभग पांच गुना बड़ी है। खास बात यह है कि हाइड्रोन ट्रेन पूरी तरह से रेलवे के इंजीनियरों ने डिजाइन किया है।

रेलवे बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा महाशक्तियों के एलीट क्लब में छठे सदस्य के रूप में शामिल हो गया है, जिनके पास हाइड्रोजन तकनीक से पैसेंजर ट्रेन चलाने का सामर्थ्य है। अधिकारी ने बताया कि भारत ने विदेशों की तरह नए सिरे से अरबों रुपये की पूरी नई ट्रेन खरीदने के बजाय अपनी पुरानी डीजल डेमू (लोकल ट्रेन) ट्रेनों को ही अपग्रेड किया। अधिकारी ने बताया कि जर्मनी ने व्यावसायिक स्तर पर हाइड्रोजन ट्रेन चलाने वाला दुनिया का पहला देश है।
वहीं चीन एशिया में इस तकनीक को पटरी पर उतारने वाला पहला देश बना। जापान, अमेरिका और फ्रांस में इस तकनीकी का ट्रायल और विकास के विभिन्न स्तरों पर कार्य कर रहा है। जबकि भारत दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोन ट्रेन को पटरी पर उतारने को तैयार है।  भारत भी महाशक्ति क्लब का सबसे नया और अपनी तरह का अनूठा सदस्य बन गया है।
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जर्मनी जैसे अमीर देशों ने करोड़ों यूरो खर्च कर फ्रांस से बनी-बनाई ट्रेनें खरीदीं, वहीं भारतीय रेलवे ने पुरानी डीजल ट्रेनों को कबाड़ करने के बजाय चेन्नई की आईसीएफ में चमचमाती स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेनों में बदल दिया। कोर फ्यूल सेल भले ही विदेशी तकनीक पर आधारित हों, लेकिन इसका पूरा सॉफ्टवेयर, इंटीग्रेशन, सुरक्षा सेंसर और रिफ्यूलिंग सिस्टम शुद्ध रूप से मेड इन इंडिया है।
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दुनिया की पहली व्यावसायिक हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन का परिचालन सितंबर 2018 में जर्मनी के ब्रेमर्वरडे शहर में हुआ था, जिसे फ्रांसीसी दिग्गज एलस्टोम ने बनाया था। भारत ने महज कुछ वर्षों के भीतर इस तकनीक को अपने घरेलू स्तर पर विकसित कर दुनिया को चौंका दिया है।
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देश के 98 फीसदी से अधिक ब्रॉडगेज नेटवर्क का विद्युतीकरण हो चुका है। लेकिन शिमला-कालका, दार्जिलिंग, कांगड़ा घाटी और नीलगिरी जैसे संवेदनशील पर्वतीय व हेरिटेज रूट्स पर खंभे गाड़ना और तार बिछाना पर्यावरण के लिए नुकसान देय है। इन वादियों को डीजल के धुएं से बचाने के लिए हाइड्रोजन ट्रेनें ही
बेहतर विकल्प साबित होंगी।

 

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