नई दिल्ली, शिवानी सिंह
देश के राष्ट्रीय राजमार्गों के टोल प्लाजा पर लगे फास्टैग और ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकॉग्निशन (एएनपीआर) कैमरे अब सिर्फ टोल वसूली का जरिया नहीं रहेंगे। केंद्र सरकार इनका उपयोग वाहन चोरी, संगठित अपराध और आतंकवाद पर नकेल कसने के लिए करने जा रही है।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने गत सप्ताह इसके लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। इसके तहत एनआईए, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), पुलिस और परिवहन विभागों जैसी केवल अधिकृत एजेंसियों को ही इस डेटा का नियंत्रित एक्सेस मिलेगा। नागरिकों की निजता बनाए रखने के लिए यह डेटा सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। डेटा एक्सेस के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एओपी) तय किया गया है, जिसके तहत केवल वरिष्ठ अधिकारियों के अनुरोध पर ही जानकारी साझा होगी।
मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा में गेम-चेंजर साबित होगा। पूर्व में आतंकी हमलों में वाहनों को विस्फोटक ले जाने या वाहन-जनित आईईडी (वीबीआईईडी) के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। आतंकी कार, ट्रक, वैन या मोटरसाइकिल आदि को वाहन एक प्रकार से एक शक्तिशाली विस्फोटक उपकरण या बम में बदल देते हैं। अब एनआईए और इंटेलिजेंस एजेंसियों को डायरेक्ट फीड मिलने से ब्लैकलिस्टेड या संदिग्ध वाहनों के टोल प्लाजा पर पहुंचते ही रियल-टाइम अलर्ट जारी हो जाएगा। इससे संवेदनशील या सीमावर्ती क्षेत्रों में संदिग्ध वाहनों की आवाजाही पर नजर रखना और हमले के बाद आतंकियों को ट्रैक करना संभव होगा।
अधिकारी ने बताया कि भारत में हर साल औसतन 1.5 लाख से 2 लाख वाहन चोरी होते हैं, जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक मामले दिल्ली-एनसीआर से जुड़े होते हैं। चोरी के वाहन चंद घंटों में पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू-कश्मीर या नेपाल सीमा की ओर भेज दिए जाते हैं। अपराधी अक्सर फर्जी नंबर प्लेट या क्लोन फास्टैग का सहारा लेते हैं। अब एएनपीआर कैमरे वाहन की नंबर प्लेट के साथ-साथ उसके रंग, मेक और मॉडल का मिलान करेंगे। फास्टैग और गाड़ी के वास्तविक विवरण में अंतर मिलते ही टोल प्लाजा पर वाहन को पकड़ा जा सकेगा।
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इस व्यवस्था से हिट एंड रन मामलों में भागने वाले वाहनों की पहचान तुरंत हो सकेगी। दुर्घटना स्थल के आसपास के टोल प्लाजा का टाइम-स्टैम्प और व्हीकल ट्रैकिंग डेटा निकालकर आरोपी वाहन का सटीक रूट मैप तैयार किया जा सकेगा। इसके अलावा लूट, डकैती, अपहरण और हथियारों की तस्करी में शामिल वाहनों को भी ट्रैक करना आसान होगा।
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