नई दिल्ली, अनिल सिंह चौहान
वंदे भारत एक्सप्रेस, राजधानी, और शताब्दी जैसी हाई-स्पीड ट्रेनों इंजनों के केबिन में लगाए गए ड्राइवर अलर्टनेस एंड फटीग मॉनिटरिंग सिस्टम (एआई कैमरों) का हालिया ट्रायल डेटा चौंकाने वाला है। इसके मुताबिक सुबह के वक्त (तड़के) बड़ी संख्या में ड्राइवर माइक्रो स्लीप (हल्की-गहरी झपकी) के शिकार हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह सीधे तौर पर किसी बड़े हादसे को न्योता देने जैसी है। ड्राइवर जहां इसे लगतार लंबी ड्यूटी और सप्ताहिक विश्राम किए बिना ट्रेन चलाने का कारण बता रहे हैं। वहीं, रेलवे इस मसले पर चुपी साधे हुए है।
रेलवे के सूत्रों ने बताया कि पायलेट प्राजेक्ट के तहत शुरू किए गए निगरानी तंत्र के आंकड़ों के अनुसार रात 2:00 बजे से तड़के 05:00 बजे के बीच ड्यूटी कर रहे बड़ी संख्या में ड्राइवर (लोको पॉयलेट व सहायक लोको पॉयलेट) माइक्रो स्लीप (कुछ सेकंड के लिए पलकें झपकना या गहरी झपकी आना) के लक्षण दर्ज किए गए हैं। दावा है कि हर तीसरा ड्राइवर माइक्रो स्लीप का शिकार है।
रेलवे बोर्ड और अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) के तहत इस फटीग मॉनिटरिंग सिस्टम की आंतरिक समीक्षा में यह बात सामने आई है। केबिन में लगे एआई कैमरे लोको पायलट के चेहरे के भाव, आंखों की पुतलियों और झपकी (आई-ब्लिंक) को लगातार ट्रैक करते हैं। यदि चालक को नींद की झपकी (माइक्रो-स्लीप) आती है या ध्यान भटकता है, तो यह सिस्टम ऑडियो अलार्म बजाकर उन्हें अलर्ट करता है।
इस प्रायोगिक परीक्षण के तहत देश भर के विभिन्न मंडलों में लगभग 500 से अधिक लोको पायलटों और असिस्टेंट लोको पायलटों की ड्यूटी के दौरान आई-ब्लिंक (आंखों की झपकी) और चेहरे के भावों को एआई कैमरों के जरिए ट्रैक किया गया। रेलवे ने गत वर्ष से सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए केबिनों में ड्राइवर अलर्टनेस एंड फटीग मॉनिटरिंग तकनीक का ट्रायल शुरू किया था।
वर्तमान में यह एआई आधारित फटीग मॉनिटरिंग सिस्टम देश भर के लगभग 1,200 से 1,500 इलेक्ट्रिक और डीजल लोकोमोटिव्स (इंजनों) में इंस्टॉल किया जा चुका है। भारतीय रेलवे में स्वीकृत पदों के अनुसार लगभग 1,00,000 से अधिक लोको पायलट और असिस्टेंट लोको पायलट (एएलपी) का कैडर है। हालांकि, वर्तमान में लोको रनिंग स्टाफ में भारी कमी है। जिसके कारण मौजूद चालकों पर अतिरिक्त वर्कलोड और बिना साप्ताहिक विश्राम के लगातार काम करने का दबाव बना रहता है। इस विषय पर सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता से कई बार जानकारी मांगी गई, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
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एआईएलआरएसए के संगठन सचिव गौतम गोस्वामी ने कहा कि झपकी व थकान का एकमात्र कारण यह है कि ड्राइवरों से लगातार 12 से 14 घंटे ट्रेनें चलाई जाती हैं। ड्राइवर कई दिनों तक बिना साप्ताहिक विश्राम के लगातार ड्यूटी करने पर विवश है। उन्होंने कहा कि माइक्रो स्लीप को अनुशासनहीनता न मानकर इसे ड्यूटी आवर्स के उल्लंघन से जोड़ा जाना चाहिए। गौतम ने मांग करते हुए कहा कि बड़े पैमाने पर ड्राइवरो के खाली पदों को भरा जाए। नियमानुसार ड्राइवरों को मुख्यायल विश्राम व साप्ताहिक अवकाश दिया जाए। अन्यथा रेल संरक्षा से खिलवाड़ के खिलाफ संगठन आंदोलन करने पर मजबूर होगा।
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यूरोपीय देश और ब्रिटेन: चालकों के लिए 8 घंटे से अधिक की ड्यूटी सख्त मना है। ट्रेनों में बायो-सेंसर लगे होते हैं। यदि चालक का तनाव या फटीग लेवल बढ़ता है, तो ट्रेन स्वतः सुरक्षित मोड में चली जाती है और रोस्टर अपने आप री-शेड्यूल हो जाता है।
जापान (शिंकानसेन): बुलेट ट्रेनों में चालकों की नींद और जैविक स्थितियों को मॉनिटर करने के लिए स्मार्ट वियरेबल बैंड्स का इस्तेमाल होता है। शिफ्ट बदलने का समय मिनटों के हिसाब से कड़ा रहता है।
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